Tuesday, 27 March 2012

chaand ko kya maloom...........!

एक शाम जो खामोश थी / आसमान जो धीरे-धीरे गहरा नीला होता जा रहा था/
उसी में से धुले हुवे कपडे की तरह यह चाँद उभर गया /
मैं फिर से प्रकृति के जन्म को देख रहा हूँ /  कुछ ऐसे ही भ्रम थे उस लम्हे जब पाया /
कि वह पाखी भी मेरी उड़ानों में हमसंगी है .
Post a Comment